प्रादेशिकता नहीं....राष्ट्रीयता
   

 

भारत में अगर खेलों की बात चले तो दस में से सात तो क्रिकेट की ही बात करेंगे | क्रिकेट मानो भारत में एक मजहब ही बन गया है | मगर पिछले कुछ सालों में दूसरे खेलों के प्रति जागरूकता और रुझान बढ़ता दिखाई देता है और अगर ऐसे में ऑलंपिक या कॉमनवेल्थ गेम्स चल रहे हों तो शायद ये झुकाव और भी परवान चढ़ता है | सचिन, गांगुली, द्रविड़, धोनी, विराट, धवन और रोहित शर्मा के साथ-साथ लोग अब सिंधू , साक्षी, विजेन्दर, अभिनव और मेरी कॉम को भी अपना “स्टार”, अपना “आयडल” और अपनी प्रेरणा मानने लगे हैं | यह बदलाव भारत के लिए जरुरी था |

 

४ अप्रैल २०१८ को ऑस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट में कॉमनवेल्थ गेम्स शुरू हुए और दुनिया की नजरें करारा स्टेडियम पर टीक गईं | भारत के लिए कॉमनवेल्थ गेम्स यानि राष्ट्रमंडल खेल काफी मायने रखते हैं क्योंकि इन खेलों में भारत का प्रदर्शन हमेशा ही उल्लेखनीय रहा है | १७ गोल्ड मेडल्स के साथ आज भी भारत तीसरे स्थान पर अपना हक़ बनाए हुए है और उम्मीद है की मैडल टैली में वह और उपर चढ़ सकेगा | जहाँ देश राष्ट्रमंडल खेलों में मैडल बटोर रहा है , वहीँ ९ अप्रैल को भारत की “उड़नपरी” पी.टी. उषा के एक ट्वीट ने इंटरनेट पर हलचल मचा दी | उन्होंने भारतीय मिडिया के रवैय्ये पर कड़ा एतराज़ जताते हुए कहा कि देश के एथलीट जहाँ एक ओर विश्व में अपना नाम और पहचान बना रहे हैं और देश की गरिमा को अधिक ऊँचा क रहे हैं वहाँ भारतीय मिडिया अब भी उनकी स्थानिक पहचान को ही बढ़ावा देते हुए उसे उजागर करने का काम कर रही है | ट्वीटर पर अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि क्या दूसरे देश जीतने वाले एथलीटों को प्रांतों के हिसाब से बाँटते हैं ? अगर नहीं तो हम क्यों आज भी किसी जीतने वाले को हरियाणा, दिल्ली या चेन्नई का चश्मा लगाकर देखते हैं ? पी. टी उषा के इस कथन का सामान्य नागरिकों से लेकर खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठोर तक सभी ने समर्थन किया है | बाद में उषा ने फिल्म “चक दे इंडिया” का संदर्भ देते हुए शाहरुख़ खान का एक प्रसिद्ध डायलॉग भी साँझा किया – “'मुझे स्‍टेट्स के नाम न तो सुनाई देते हैं और न दिखाई देते हैं. सिर्फ एक मुल्‍क का नाम सुनाई देता है इंडिया”
 
 
 

 

कुछ साल पहले जब मेरी कॉम ने ऑलंपिक पदक जीता था तब हर हिंदुस्तानी ने उसपर फक्र जताया था और फिल्म तो उसकी जीवनी पर भी बनी | मगर मेरी कॉम जहाँ से आती है उस मणिपुर के साथ-साथ दुसरे “नॉर्थ ईस्ट” के छात्रों के साथ अपने ही देश के दुसरे राज्यों में भेदभाव हो रहा था | क्या देश के दुसरे प्रदेश में पढने या खेलने जाना गलत है ? जब हम में से कुछ के मन में अब भी दुसरे राज्यों के प्रति धिक्कार है तो क्या हमें हमारे इन एथलीटों की जीत का जश्न मनाने का अधिकार है?

 

बात फिल्म की हो या कॉमनवेल्थ की .... क्या भारत में हमेशा ही खिलाडियों की प्रादेशिकता उनकी राष्ट्रीयता पर हावी नहीं होती ? क्या हम वाकई किसी खिलाडी को सिर्फ भारतीय के रूप में नहीं देख सकते ? क्यों उसके उपनाम (surname) या उसके शहर या राज्य से हटकर उसको देखा नहीं जा सकता ? क्यों सिर्फ तिरंगे की शान हमारे लिए काफ़ी नहीं है ? क्यों हमें हमारी प्रादेशिकता की बीन बजाते हुए अपने ही दोस्तों में अपने ही प्रदेश के किसी खिलाडी का नाम लेकर शेखी बघारनी है ? जिस दिन प्रादेशिकता के यह पर्दे गिर जाएँगे उस दिन भारत सही मायने में खेलों के मैदान में अपना झंडा सबसे ऊपर कर पाएगा |

 

भारत (भा+रत) शब्द का अर्थ होता है विवेक रूपी प्रकाश | जिस दिन यह प्रकाश हमारे भीतर की आत्मा और मन को प्रकाशित कर बाहर निकलेगा , उस दिन इसकी रौशनी से दुनिया की आँखें चुंधिया जाएँगी | वह दिन ज्यादा दूर नहीं है क्योंकि देश में यह बदलाव धीरे धीरे नज़र आने लगा है |

 

एन वाई.सी.एस. इंडिया भी खेल-क्षेत्र में गेल इंडिया के साथ मिलकर देश के कोने-कोने से हुनर खोज रही है | एथलीटों की खोज का हमारा सफ़र तीन सीजन पार कर चुका है | हम हर राज्य के हर ज़िले में पहुँचना चाहते हैं ताकि “भारत” को अपना “भविष्य” मिल सके | जब महीनों की मेहनत के बाद राष्ट्र स्तर पर हमें हमारे हुनरबाज़ मिल जाते हैं तब वह नाशिक की “ताई बामणे” या दिल्ली का “निसार अहमद” या केरला की “जिस्ना मैथ्यू” नहीं रहते , वह बन जाते हैं – भारत की शान , भारत की रफ़्तार – “दी इंडियन स्पीड स्टार |

 

किसी भी राष्ट्र की उन्नति के लिए पूरे समाज का एक होना जरुरी है | खेल सामाजिक एकता की भावना को बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है | वास्तविक देखा जाए तो खेल राष्ट्रीयता का मजबूत आधार बन सकता है | खेल क्षेत्र ऐसा क्षेत्र है जहाँ मैदान पर जाति पात व ऊंच नीच का भेद नहीं होता है। इन खेलों में भाग लेने वाले खिलाड़ी सभी समान होते है। तथा आपस में एकता की मिसाल कायम करते है। यही एकता उनकी सराहना में भी दिखानी चाहिए|

 

पी.टी उषा स्वयं #NYCSGAILRaftaar से जुडी हैं और हमारी मार्गदर्शक रही हैं | उनके विचारों से पूरा इत्तिफ़ाक रखते हुए हम उनके ट्वीट में प्रयुक्त हैशटैग्स को अपना खेलमंत्र मानते हैं| जब हम देश की आंतरिक सीमाओं को भुलाकर (#NoBoundaries) एक देश , एक राष्ट्र (#OneNation) के रूप में विश्व का सामना करेंगे , तभी हमारी जीत को ललकारने वाला शायद ही कोई मिले |